4/21/2009

बचपन

लोग कहते हैं
अब मैं ब़ड़ा हो गया हूँ

बच्चों सा
हँस और खिलखिला नहीं सकता
उनकी तरह
छलांगें भी नहीं लगा सकता
यहाँ तक कि
तुतली भाषा में बात भी नहीं कर सकता


और न ही
गेंद समझकर चाँद के लिए
जिद कर सकता हूँ
क्योंकि मैं ब़ड़ा हो गया हूँ

लेकिन मन कहता है नहीं
मैं सोचता हूँ क्यों नहीं

मन कहता है
मैं उस अवस्था में पहुँच गया हूँ
जहाँ वापस बचपन लौट आता है

यानी मेरे ब़ड़प्पन में बचपन
लौट आया है/जहाँ
मैं हँस सकता हूँ
खिलखिला सकता हूँ
तुतला सकता हूँ

लेकिन छलाँगे नहीं लगा सकता
और न ही चाँद को पाने की
जिद कर सकता हूँ

तो क्या यहीं फर्क है
बचपन में और
बड़प्पन के बचपन मे?
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संजय परसाई की एक कविता


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3 comments:

  1. बहुत खूब।

    जिन्दगी कहते हैं बचपन से बुढ़ापे का सफर।
    लुत्फ तो हर दौर का है पर जवानी और है।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  2. बहुत सुन्दर...और भी तो मित्र धन होंगे..उन्हें भी स्थान दें. एक तो लिख ही रहा है यह टिप्पणी. :)

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